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उनकी शहादत पर मुझे गर्व नहीं, दर्द होता है

उनकी शहादत पर मुझे गर्व नहीं, दर्द होता है

‘शमिता रोते हुए कह रही थीं कि 31 मार्च को ही तो रजनीश छुट्टियों में नए घर का काम पूरा करके मणिपुर गए थे। तीन दिन पहले भी उन्होंने फोन करके नए घर में प्रवेश के लिए तैयार करने को कहा था। पति के शव पर बिलखती शमिता कह रही थीं कि अब नए घर में पति के बिना वह कैसे प्रवेश कर पाएंगी। उनके बेटों शूजल और शिवांग को तो सबका रोना समझ ही नहीं आ रहा था। वे यही कह रहे थे कि उनके पापा आएंगे और उसके बाद ही वे नए घर में रहने जाएंगे।’

मणिपुर में शहीद कांगड़ा के एक जवान के घर पर कल यह आलम था। जब कभी मैं जान गंवाने वाले जवानों, उनके माता-पिता, पत्नी और बच्चों वगैरह के बारे में सोचता हूं, आत्मा हिल जाती है। शहादत, कुर्बानी, गर्व… ये सब बेकार के जुमले लगने लगते हैं। वे एक ही सपना लिए अपने परिवार से दूर मुश्किल हालात में ड्यूटी करते हैं। यह सपना होता है- परिवार के सपनों को पूरा करना। अम्मा-बापू की दवा-दारू में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए, पत्नी कभी उदास नहीं होनी चाहिए, बच्चों की पढ़ाई में कोई कसर नहीं रहनी चाहिए, फलां रिश्तेदार की शादी में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए, वगैरह-वगैरह। इनसे अलग एक और ख्वाहिश- एक छोटा सा घर बनाना है, जहां रिटायरमेंट के बाद आराम से रहा जाएगा।

फुरसत में जवान सोचता होगा कि रिटायर होने पर बूढ़े मां-बाप की सेवा करूंगा, पत्नी और बच्चों को जो वक़्त नहीं दे पाया, उसकी भरपाई करूंगा। जिस जगह बचपन बीता था, वहीं पर बुढ़ापा गुज़ारूंगा। उन्हीं खेतों में घूमूंगा, उन्हीं पेड़ों पर चढूंगा, उन्हीं रास्तों से गुजरूंगा। मगर अचानक एक गोली, एक धमाका और सब ख़त्म। सब सपने भी गायब। आखिर में तिरंगे में लिपटकर वह फिर उसी आंगन में आता है, उन्हीं गलियों से गुजरता है; मगर कुछ देख नहीं सकता, महसूस नहीं कर सकता। ज़िन्दगी ख़त्म, तो सब ख़त्म। किसी चीज़ का कोई मतलब नहीं होता।

बंदूक की फायरिंग के साथ सलामी और ‘अमर रहे’ जैसे नारों का भी नहीं। कभी शहीद जवान की जगह खुद को या अपने किसी करीबी को रखकर सोचिए, मेरी बात समझ आ जाएगी। (मुंबई हमले में शहीद मेजर संदीप उन्नीकृष्णन को आखिरी बार निहारतीं उनकी मां) किसी हादसे में मौत हो जाए, बात समझ में आती है कि इसमें कोई कुछ नहीं कर सकता। मगर इस तरह से किसी की जान नहीं जानी चाहिए। इंसान की इंसान के हाथों हुई ये मौत हत्या है। यह सिलसिला बंद होना चाहिए। जमीन के टुकड़ों या चन्द लोगों की सनक की राजनीति न जाने ऐसी कितनी ही मौतों के लिए जिम्मेदार है। संख्या में गिनती होती है कि आज फ्लां जगह पर इतने जवान शहीद, फेसबुक पर RIP टाइप होता है और फिर सब नॉर्मल।

मेरी गुज़ारिश है कि गर्व करना बंद कीजिए, दर्द को महसूस करना शुरू कीजिए। ओ नेताओ, अब तक जो होता रहा, वो तो हो गया। आगे हम क्या और कैसे सही कर सकते हैं, यह सोचिए। इतिहास की नहीं, भविष्य की चिंता कीजिए। निपटाइए ये झगड़े, सुलझाइए ये विवाद। यथास्थिति बनाए रखकर आप जवानों की ज़िन्दगी से खेल रहे हैं। अपनी नाकामी और अक्षमता की बलि चढ़ा रहे हैं आप उन्हें।

Posted on: April 5, 2017Aadarsh Rathore

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