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यहां इतना कुछ है, फिर भी क्यों पिछड़ा रह गया लड-भड़ोल?

यहां इतना कुछ है, फिर भी क्यों पिछड़ा रह गया लड-भड़ोल?

लड-भड़ोल  इलाका मंडी के बेहद खूबसूरत इलाकों में से है। यह बात अलग है कि आज यह उपेक्षित है और बुनियादी सुविधाओं से वंचित है मगर यहां के लोग अपनी मेहनत और काबिलियत के दम पर देश-दुनिया में विभिन्न क्षेत्रों में नाम कमा रहे हैं। लोग तो मेहनती हैं मगर हमारे नेता मेहनती नहीं। जोगिंदर नगर विधानसभा से जुड़ा मंडी जिले का यह इलाका आज भी खुद कटा हुआ महसूस करता है। दरअसल इन हालात के लिए कोई और नहीं बल्कि हमारे नेता जिम्मेदार हैं। ऐसे नेता, जिन्होंने वोटों के लिए तो लड-भड़ोल के लोगों का इस्तेमाल किया मगर चुने जाने के बाद भूल गए।

जब मैं छोटा था, तभी से लड-भड़ोल से मेरा बड़ा लगाव है। बचपन में एक बार फोलो एल्बम में मैंने देखा कि मम्मी-पापा ने मुझे गोद में उठाया हुआ है। जगह पहचान में नहीं आई तो पूछा कि कौन सी जगह यह तस्वीर ली है। पापा ने बताया कि यह उस दौर की फोटो है जब वह लड-भड़ोल स्कूल में पोस्टेड थे। बाद में उनका ट्रांसफर जोगिंदर नगर स्कूल हो गया था। तो जिज्ञासा हमेशा रही लड-भड़ोल जाने की। हैरानी की बात यह है कि मेरा गांव सिकंदर धार (भभोरी धार) के इस ओर है और दूसरी तरफ ही लड-भड़ोल है, फिर भी मैं वहां के बारे में ज्यादा नहीं जानता था और न ही गया था। क्यों? क्योंकि जोगिंदर नगर से लड-भड़ोल जाने के लिए सीधी सड़क नहीं थी। खैर, कुछ साल बाद बैजनाथ होते हुए माता सिमसा के मंदिर जाने का मौका मिल ही गया। इससे पहले एक दो मौकों पर और गया था मगर तब की याद नहीं है बचपन की।

धूल भरी सड़क पर गाड़ी बढ़ती जा रही थी। कहीं गड्ढे तो कहीं सड़क के नाम पर नालियां। मैं गाड़ी की खिड़की से सिर बाहर निकालकर देखता जा रहा था। जहां देखो वहां खूबसूरत नजारे। दिल खुश हो गया। मैं हैरान था कि जोगिंदर नगर (मंडी जिले) में होने के बावजूद यहां आने के लिए बैजनाथ (कांगड़ा) होकर क्यों आना पड़ता है। क्यों कोई सीधी सड़क नहीं है। खैर, उस वक्त को इस बारे में ज्यादा नहीं सोचा। फिर एक दो बार और जाना हुआ रिश्तेदारों के यहां होने वाले समारोहों में। मगर मुझे इलाके में विकास के नाम पर ज्यादा बदलाव नजर नहीं आया। पिछले दिनों एक खबर पढ़ी की लड-भड़ोल से एक लड़के को लर्नर लाइसेंस बनाने के लिए 5 चक्कर जोगिंदर नगर एसडीएम ऑफिस के काटने पड़े। तब मैं चौंका कि क्या हालात अब भी ठीक नहीं हुए हैं? मामूली से कामों के लिए लड इलाके के लोगों को अभी भी इतना संघर्ष करना पड़ रहा है? अगर लड-भड़ोल और जोगिंदर नगर के बीच कनेक्टिविटी सही होती तो ऐसे हालात पैदा न होते।

80 के दशक के आखिर में ठाकुर रतन लाल जब जोगिंदर नगर के विधायक थे, उन्होंने कोशिश की थी कि जोगिंदर नगर को डायरेक्ट सड़क के माध्यम से लड-भड़ोल से जोड़ा जाए। उनकी कोशिश तो कामयाब नहीं हो पाई, मगर इस ओर न तो पहले किसी ने ध्यान दिया न बाद में। नतीजा यह रहा लड-भड़ोल की जनता आज सभी पार्टियों के लिए सिर्फ वोट बैंक बनकर रह गई है। लड इलाके के बहुत से परिवार बैजनाथ में आकर बस गए हैं। पूरी बेल्ट के लोग खरीददारी वगैरह के लिए बैजनाथ आते हैं, क्योंकि नजदीक पड़ता है। सही मायनों में बैजनाथ आज चमका है तो लड-भड़ोल के लोगों की वजह से, उनकी पूंजी की वजह से। अगर सही वक्त सही ढंग से लड-भड़ोल को जोगिंदर नगर से कनेक्ट कर दिया जाता तो आज दोनों इलाके विकसित होते।

अब जोगिंदर नगर और लड-भड़ोल के बीच जो डायरेक्ट सड़क बनी भी है, वह भी ऐसी है कि दूरी कम नहीं हो पाई है। सरकारी कामों के लिए आना-जाना पड़ जाए तो करीब 60 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। वादे हर कोई करता है, मगर सक्षम पदों पर बैठने के बावजूद मौजूदा विधायक भी इस इलाके के लिए कुछ खास नहीं कर पाए। जो अब तक कुछ नहीं कर पाए, मुझे नहीं लगता कि वे कल कुछ नया कर देंगे। हमें कोई ऐसा नेता चाहिए तो विजनरी हो। खाली टाइम पर गप्पें मारने या फालतू में ऊंघने के बजाय वह चिंतित रहे कि यार मेरे इलाके में क्या समस्या है और उसे कैसे ठीक किया जा सकता है। नेता के अंदर जिम्मेदारियों का अहसास होना चाहिए। उसे लगे कि यार मैं जवाब कैसे दे पाऊंगा अगली बार वोट मांगते वक्त। मगर ऐसी भावना आजकल के नेताओं में कहां देखने को मिलती है।

लड-भड़ोल में तो पर्यटन की भी अपार संभावनाए हैं और खासकर धार्मिक पर्यटन की। माता सिमसा, त्रिवेणी महादेव और कुड महादेव जैसी जगहों को सही से प्रमोशन हो तो हर साल लाखों श्रद्धालु आ सकते हैं। बाहर के लोगों के लिए कुड महादेव में बड़ी सी गुफा के अंदर चट्टान से गिरते पानी के नीचे बने शिवलिंग और अन्य कृतियां देखना किसी अचंभे से कम नहीं होगा। जब बाहर से टूरिस्ट आते हैं तो स्थानीय लोगों को रोगजार मिलता है। दुकानें खुलती हैं, रहने के लिए होम स्टे या होटेल खोले जाते हैं।  दुकानदारों की बिक्री बढ़ती है। इस तरह से तो प्रदेश की इकॉनमी में भी लड-भड़ोल बड़ा योगदान दे सकता है। जब लोगों का आवागमन बढ़ता है तो सरकार को अन्य संसाधनोंं को भी सही रखना पड़ता है। सड़कें अच्छी करनी पड़ती हैं, पानी चाहिए चौबीसों घंटे, अस्पताल में सुविधाएं होनी चाहिए। मगर अफसोस, अभी तक ऐसा कुछ नहीं दिखता।

इस इलाके के कई गांवों को कई-कई दिन तक पानी आने का इंतजार करना पड़ता है। मजबूरन प्राकृतिक स्रोतों का रुख करना पड़ता है। अभी तो गर्मियां सही से शुरू भी नहीं हुईं मगर पानी की किल्लत शुरू हो गई है। जोगिंदर नगर साइड से रणा खड्ड से उठाऊ पेय जल योजनाओं का भी लाभ नहीं लिया जा रहा। आजादी के इतने साल बाद भी अगर लोगों को पीने के लिए साफ पानी नहीं मिल पाए तो यह उस राज्य की सरकार और स्थानीय नेताओं के लिए शर्म की बात है। इलाके में किसी को हार्ट अटैक आ जाए तो नजदीकी अस्पताल पहुंचाते-पहुंचाते ही जान चली जाए। अस्पताल में पहुंचा भई दिया जाए तो क्या गारंटी कि वहां पर इलाज हो जाएगा। ऑक्सिजन तक के सिलिंडर तो मिलते नहीं हैं सरकारी अस्पतालों में।

इलेक्शन नजदीक हैं और टिकट की उम्मीद लगाने वाले लोग ऐक्टिव हो चुके हैं। लड-भड़ोल में भी नेताओं का आना-जाना शुरू हो चुका होगा। वादे किए जा रहे होंगे और एक-दूसरे को दोष दिया जा रहा हो। कुछ नेता महिला मंडल भवन बनाने का क्रेडिट ऐसे ले रहे होंगे जैसे आईआईटी और आईआईएम खोल दिया हो। मगर मेरी गुजारिश है कि अगर कोई नेता आपसे वोट मांगने आता है तो पहले उससे पूछें कि भाई, अब तक क्या किया और आगे क्या करेगा और कैसे करेगा। जब तक सवाल नहीं पूछे जाएंगे, नेता हमारे मासूम लोगों को बेवकूफ समझते रहेंगे और वाकई वोट लेकर गायब हो जाएंगे। हर बार की तरह, जैसे अब तक होते रहे हैं।


परिचय:  
जोगिंदर नगर के भालारिढ़ा गांव से हूं। गांव के सरकारी स्कूल से पढ़ाई की शुरुआत की और फिर +2 तक जोगिंदर नगर बॉयज़ स्कूल में पढ़ा। दिल्ली से मास कम्यूनिकेशन में ग्रैजुएशन और पोस्ट ग्रैजुएशन करने के बाद मीडिया में काम शुरू किया। 4 साल तक विभिन्न न्यूज चैनल्स में ऐंकरिंग करने के बाद इन दिनों टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप में कार्यरत। जन्मभूमि से गहरा लगाव रखता हूं और दिल्ली से ज्यादा वक्त यहीं बिताता हूं। इलाके की समस्याओं को समझने और सुलझाने के लिए अपने स्तर पर प्रयासरत।

Posted on: April 9, 2017Aadarsh Rathore

2 thoughts on “यहां इतना कुछ है, फिर भी क्यों पिछड़ा रह गया लड-भड़ोल?

  1. Aadarsh bhai namaskaar.
    Me bhi Aapke hi zila mandi k sarkaghat se hu.
    Mene aapke gaane sune hn or wo mujhe achhe bhi lage hn. But ab aap naye gaane kyu nhi nikaal rahe. Ye meri ek request hai ki aap naye himachali gaane nikaale.
    Thank you.

  2. Need change in our place
    Good to see person like you who are still in touch with the soil
    And doing as much as good you can do
    You can also see my views on my fB post if you want

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