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ओवैसी से सबक लें गाय को माता कहकर ढोंग करने वाले नकली बेटे

ओवैसी से सबक लें गाय को माता कहकर ढोंग करने वाले नकली बेटे

वे कहते हैं कि गाय हमारी माता है। ठीक है। है तुम्हारी माता, बराबर है। इस बात से इनकार नहीं है। अरे माता कहते हो तो माता का एहतराम करो, इज्जत करो, रखवाली करो, उसकी हिफाजत करो। मां को बाजार में लाकर (मांस के लिए) नीलाम नहीं करते। मां भी बोल रहे हैं और बाजारों में बोली भी लगा रहे हैं।‘

ये एमआईएम एमएलए अकबरुद्दीन ओवैसी के उस भाषण के अंश हैं, जिनके लिए उनके खिलाफ नफरत फैलाने और देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने का मामला चल रहा है। निर्मल में दिए इस भाषण को यू-ट्यूब पर देखा। ओवैसी ने बहुत कुछ ऐसा कहा है, जो बेहद आपत्तिजनक है, लेकिन उस बकवास के बीच इन लाइनों ने न सिर्फ मेरा ध्यान खींचा, बल्कि मैं इनसे सहमत भी हुआ। ओवैसी का कहना है कि जो लोग गाय को माता कहते हैं, वे मतलबी हैं। दरअसल ओवैसी के भाषण की ये लाइनें उन लोगों को आईना दिखाती हैं, जो गाय को लेकर सियासत करने के सिवा और कुछ नहीं करते। गाय को माता मानने वाले लोग एक खास वर्ग की तरफ नफरत की भावना से भी देखते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इन लोगों के ‘अपने’ ही सबसे ज्यादा गौ हत्याएं करते हैं। जी हां, सड़कों पर आप इधर-उधर घूमती जिन गायों को देखते हैं, उन्हें इसलिए आवारा छोड़ दिया गया होता है, क्योंकि वे किसी काम की नहीं होतीं। जो गायें प्रजनन नहीं कर पातीं या बूढ़ी हो जाती हैं, उन्हें बोझ समझा जाने लगता है। गायों को दूध के लिए पालते हैं लोग। अब अगर गाय दूध नहीं देगी, तो फिर वो उनके किस काम की? इसलिए इन ‘नकारी’ माताओं को लावारिस छोड़ दिया जाता है। ये माताएं सड़कों पर कूड़े के ढेर में मुंह मारती हैं और लोगों की गालियां सुनते हुए, मार खाते हुए इधर से उधर भागती रहती हैं। थक हारकर एक दिन ये माताएं दर्दनाक मौत मर जाती हैं। यह भी तो गौ हत्या ही है, फर्क बस इतना है कि हत्या के बाद मांस नहीं खाया जाता।

हैरानी इस बात की है कि यह सब गाय को माता मानने वालों की आंखों के सामने होता है। कहीं गाय की हत्या होती है, तो लोगों की भावनाएं आहत हो जाती हैं। क्या सड़क पर ये मंजर देखकर उनकी भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचती? अगर वे गाय को माता मानते हैं, तो गाय की ऐसी दुर्गति कैसे देख सकते हैं? क्या यही है मां के लिए उनकी इज्जत? मैं जानता हूं कि इन सवालों के जवाब में वे लोग अपनी मजबूरियां गिनाएंगे। गाय को लेकर सिर्फ राजनीति ही नहीं होती, गोरखधंधा भी चलता है। गाय की सेवा के नाम पर न जाने कितने सदन, समितियां, संस्थाएं वगैरह बनी हैं, लेकिन वे गायों के लिए कुछ भी नहीं करतीं। सच यह है कि हम अपनी जीवन में दोहरे मापदंड अपनाते हैं। गाय को माता मानना भी इसका एक उदाहरण है। स्वार्थ है तो गाय माता है, वरना एक जानवर। मैंने यह सब महसूस किया एक घटना के बाद। आप भी जानिए, क्या देखा था मैंने:

सुबह के 8 बज रहे थे। अचानक सिरहाने के पास टेबल पर रखा फोन वाइब्रेट हुआ। आंख मलते हुए मैंने स्क्रीन पर नज़र दौड़ाई, अनीश का फोन था। अनीश और इतने सवेरे! आखिर क्या वजह है जो वो मुझे अभी फोन कर रहा है? गला खराशने के बाद कॉल रिसीव किया। ‘गुड मॉर्निंग आदर्श। भाई सुबह-सुबह इसलिए परेशान कर रहा हूं कि किसी चैनल के रिपोर्टर का नंबर चाहिए। अरे वो गाय… बेचारी तड़प रही है। अभी तक उसकी खोज-खबर लेने कोई नहीं आया। अगर जल्दी ही उसका इलाज नहीं किया गया तो बेचारी की जान निकल जाएगी। अब इतने दिन हो गए, न पुलिस कोई ऐक्शन ले रही है और न ही वेटेरिनरी डॉक्टर इंटरेस्ट ले रहे हैं। तुम जल्दी से किसी रिपोर्टर से शूट करवा दो या फिर खुद ही आ जाओ।’ यह सब कहते हुए अनीश की आवाज कांप रही थी। मैंने कहा, ‘भाई, हिमाचल प्रदेश में चैनल्स ने अपने बहुत कम रिपोर्टर रखे हैं। कुछ स्ट्रिंगर हैं और उन्हें भी कुछ खास जगहों पर रखा गया है। अभी जोगिन्दर नगर में तो कोई नहीं है। चलो फिर भी देखता हूं…।’

अनीश, मेरे मामा जी का लड़का। मुझसे तीन साल बड़ा है, लेकिन हम दोनों में खूब पटती है। बचपन में काफी समय मैंने मामा जी के घर में गुज़ारा है। हमारा क्वॉर्टर मामा जी के घर के पास ही था, सो स्कूल के बाद वहीं चला जाया करता था। कई मुद्दों पर हम दोनों की सोच एक जैसी है। अपने गांव, अपनी ज़मीन, अपने परिवेश और पशुओं वगैरह से हम दोनों को खास लगाव है। उन दिनों मैं कुछ दिनों के लिए हिमाचल प्रदेश गया था। मैं मंडी जिले के जोगिन्दर नगर का रहने वाला हूं। घर जाकर पता चला कि इन दिनों अनीश भी आया हुआ है। उससे मिलने के इरादे से मैं मामा जी के घर जा पहुंचा। वहां गया तो पता चला कि वो जंगल की तरफ गया हुआ है। मैं उससे मिलने के इरादे सें जंगल वाली सड़क में आगे बढ़ने लगा। मुझे पता था कि वह कहां मिलेगा। थोड़ा सा आगे बढ़ने पर मैं देखता हूं कि काले रंग की देसी गाय सड़क किनारे बनी नाली में लेटी हुई है और अनीश उसे चारा खिला रहा है। हम दोनों गले मिले और फिर तुरंत मैंने गाय के बारे में जानना चाहा। पता चला कि किसी ने इस गाय को दूध देना बंद करने की वजह से आवारा छोड़ दिया था। इसलिए बेचारी खाने की तलाश में यहां से वहां घूमा करती थी। लोग भी अपने खेतों में घुस आई इस गाय की पिटाई करते और इधर-उधर खदेड़ देते। एक दिन किसी ने इसे अपने खेत से भगाया और हड़बड़ाहट में बेचारी एक गहरे नाले में गिर गई। इस पर गांव के कुछ लोगों ने रस्सी वगैरह से खींचकर किसी तरह उसे बाहर निकाला। इसके बाद यह गाय जंगल की तरफ चली गई, मगर अगले ही दिन उसे इस जगह पर घायल पाया गया।

मैंने देखा कि गाय के पेट एक तरफ से फट चुका था और अंदर के अंग एक पतली सी झिल्ली को फाड़कर बाहर आने के लिए उतारू थे। ज़ाहिर है, गाय बहुत पीड़ा में थी। बेचारी हिलडुल भी नहीं सकती थी। जैसे ही उठने की कोशिश करती ज़ख्मों से खून बहने लगता। शायद ये जख्म उसे किसी जंगली जानवर के हमले ने दिया था या फिर किसी बेहरम ने अपने खेतों से भगाने के लिए धारदार हथियार से उस पर वार कर दिया था। बेबस होकर 10 दिनों से वह उसी हालत में यहां पड़ी थी। अनीश ने बताया कि उसने ऐनिमल क्रुऐलिटी ऐक्ट के आधार पर पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट दर्ज करानी चाही, लेकिन पुलिस आनाकानी कर रही है। हालांकि उसने ऐप्लिकेशन वहां पर दे दी थी। इसके साथ ही उसने पुलिस के सीनियर ऑफिसर्स समेत पीटा जैसी संस्थाओं को भी उसकी कॉपी भेज दी थी। हफ्ते से ज्यादा का वक्त बीत चुका था, लेकिन कहीं से कोई जवाब नहीं आया था। अनीश की आंखों में लाचारी मैं देख सकता था। अकेले और बिना किसी दूसरे की मदद से वह उस गाय को कहीं ले भी नहीं जा सकता था। आलम यह था कि उस गाय को धीरे-धीरे दम तोड़ते देखने के अलावा और कुछ किया भी नहीं जा सकता था। मैंने अनीश को सुझाव दिया कि वो गौ सदन या गौ सेवा समिति नाम की संस्था से बात करे। शायद वे लोग कुछ कर पाएं। एक महीने पहले ही मैंने पढ़ा था कि जब कस्बे के बाजार में कई लोगों को ज़ख्मी करने और 1 आदमी को मौत के घाट उतारने वाले आवारा सांड पर काबू पाने की कोशिश की जा रही थी, तो धार्मिक संस्थाओं ने खूब बवाल किया था। इनकी मांग थी कि सांड को कोई नुकसान न पहुंचाया जाए। इसी वजह से प्रशासन को कई दिक्कतें भी पेश आई थीं।

मैंने सोचा कि जब एक ‘हत्यारे’ जानवर के लिए वे लोग इतनी हमदर्दी दिखा सकते हैं, तो फिर ‘गौ माता’ की मदद के लिए तो वे जरूर आगे आएंगे। मगर अनीश ने जो कहा उसे सुनकर मैं हैरान रह गया। पता चला कि उस संस्था ने हेल्प करने में असमर्थतता ज़ाहिर कर दी थी। वजह, वे लोग विश्व मंगल गौ ग्राम यात्रा में भाग लेने जा रहे थे और उनके पास इस काम के लिए वक्त नहीं था। उस दिन हम गाय को चारा खिलाकर वापस आ गए। कुछ देर बात करते मैं अपने घर आ गया। इसके बाद मैं 2-3 दिनों तक कुछ विवाह समारोहों और दूसरे कामों में फंस गया। इस दौरान मैं गाय के बारे में बिल्कुल भूल गया था। उस सुबह आए अनीश के फोन से फिर मुझे ध्यान हो आया। मैं इधर बेफिक्र होकर मस्ती कर रहा था और उधर अनीश ठीक से सो भी नहीं पा रहा था। उसका फोन आने पर भी मैंने उसे झूठा आश्वासन दे दिया था। मुझे पता था कि मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा। अगर जोगिन्दर नगर में किसी चैनल का रिपोर्टर होता भी, तब भी इस मामले में कुछ नहीं किया जा सकता था। मुझे कह देना चाहिए था कि मेरे भाई! टीवी के पैमाने के आधार पर इसमें बिक सकने वाला कोई भी ‘ऐंगल’ नहीं है। न तो यह मसाला खबर है और न ही लोगों को दिलों को छू जाने वाली स्टोरी। उस गाय के लिए कुछ न कर पाने का भाव मुझे रह-रहकर कचोट रहा था। मैं परेशान था। समझ नहीं आ रहा था क्या करूं। दिनभर परेशान रहा और रात को सोचते-सोचते सो गया।

अगली सुबह मैं जल्दी जग गया और तैयार होकर मामा जी के गांव की ओर निकल पड़ा, जहां पर घायल गाय पड़ी थी। रास्ते में सोच रहा था कि आज तो कुछ न कुछ करके ही रहना है। गांव वालों को किसी तरह समझाकर इकट्ठा करके गाय को कम से कम किसी प्लेन जगह पर ला देंगे और एक छत की व्यवस्था कर देंगे। अभी ये सब सोच ही रहा था कि गाय वाली जगह पर मुझे कुछ लोग दिखाई दिए। मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ा। लोग गाय को घेरकर खड़े थे। लोगों को हटाता हुआ मैं आगे बढ़ा, तो देखा कि गाय दम तोड़ चुकी थी। लोग अपने घरों से फूल वगैरह ले आए थे और उन्होंने उसे गाय की लाश पर अर्पित कर दिया था। विडंबना। जब यह जिंदा थी, तब तो इसे एक तिनका घास नहीं खिलाया और अब उसकी देह पर पुष्पवर्षा की जा रही थी। वहीं कोने में अनीश नम आंखों से गाय की तरफ देख रहा था। मैं उससे नज़रे मिलाने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहा था। सभी लोग इकट्ठा हुए और गाय की मृत देह को खींचते हुए थोड़ी दूरी पर जंगल में अंदर ले गए। कुछ लोग पहले से ही वहां पर गड्ढा खोद रहे थे। गाय के शरीर को उस गड्डे में डालकर मिट्टी भर दी गई और ऊपर से बड़े-बड़े पत्थर रख दिए गए, ताकि जंगली जानवर किसी तरह की छेड़छाड़ न कर पाएं।

मैं सोच रहा था कि यह कैसी दुनिया है? जो लोग इकट्ठा होकर जिंदा गाय को नाली से उठाकर अच्छी जगह ले जाने नहीं आए, वे उसके मृत शरीर को ढोने के लिए तुरंत पहुंच गए। जीते जी उसे बचाने की कोशिश नहीं की, अब उसके मृत शरीर को जंगली जानवरों से बचाने की कोशिश भी की जा रही थी। यही सब कुछ इसके जिंदा रहते किया होता तो? इसी तरह के ख्यालों में डूबा हुआ था कि सड़क में एक गाड़ी रुकी। उससे पंडितनुमा वेशभूषा वाले 2 लोग उतरे। उन दोनों के हाथ में फूल और गेरुए कपड़े दिखाई दे रहे थे। उनसे साथ एक फोटोग्राफर भी था। यह फोटोग्राफर एक अखबार के लिए खबरें भी भेजा करता था। उन दोनों पंडितनुमा लोगों में से एक आगे बढ़ा और बोला, ‘जी हम गौ रक्षा सदन से आए हैं, सुना है यहां कहीं पर गौ माता परलोक सिधार गई हैं। हम उनका अंतिम संस्कार कराने आए हैं…।’ ‘हे भगवान…!’, दिल से एक कराह सी निकली।

Posted on: April 5, 2017Aadarsh Rathore

One thought on “ओवैसी से सबक लें गाय को माता कहकर ढोंग करने वाले नकली बेटे

  1. खुद को कट्टर धार्मिक कहने वालों को यह आईना देखने की जरूरत है !

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